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Showing posts with the label टीका-टिप्पणी/ Comment

इतिहास है या नायक-खलनायक की कहानी?

जब हम ऐतिहासिक किरदारों को काले-सफेद में विभाजित करके देखते हैं तो इतिहास को गल्प की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं। इतिहास के साथ इससे बड़ा कोई अन्याय नहीं हो सकता। जब हम इतिहास को नायक और खलनायक की कहानी के रूप में देखते हैं, तो समस्या उठ खड़ी हो जाती है। कारण यह कि हम जिसे अपना नायक मान लेते हैं, उसकी एक सुपरहीरो-सी छवि मन में बना लेते हैं। फिर हम उसके बारे में सिर्फ भला-भला ही सोचना, सुनना और पढ़ना चाहते हैं। हमारी कल्पनाओं में वह तमाम सद्गुणों की खान होता है। हमारी गढ़ी गई इस छवि के विपरीत कोई बात सामने लाई जाए तो हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं। वहीं जिसे हम खलनायक मानते हैं, उसमें सिर्फ और सिर्फ बुराइयां ही देखना चाहते हैं। कोई उसके व्यक्तित्व या कृतित्व के किसी सकारात्मक पक्ष को सामने रखे, तो हम उसे खारिज कर देते हैं। जबकि सच तो यह है कि इतिहास आपके-हमारे जैसे इंसानों की ही दास्तान है। हमारी तरह उनके व्यक्तित्व में भी अच्छाई-बुराई दोनों का समावेश था। उनमें खूबियां थीं, तो कमज़ोरियां भी थीं। उन्होंने अच्छे काम किए, तो कभी गलतियां भी की। परफेक्ट हीरो या परफेक्ट विलेन किस्से-कहानियों म...

गांधी का धर्म, गांधी के राम

अपने पूरे जीवन में गांधी किसी भी धर्मस्थल में बहुत ही कम गए। अपने इष्ट से जुड़ने के लिए उन्हें कभी किसी धर्मस्थल की ज़रूरत नहीं रही। वे अपने कक्ष में या फिर अपनी कुटिया के बाहर बैठकर प्रार्थना कर लेते थे। धर्म उनके लिए दिखावे की वस्तु नहीं थी।     बीते दिनों अयोध्या में भव्य राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। देश निहाल हुआ। इस दौरान बहुत-सी बातें कहने-सुनने में आईं। यह होना चाहिए था, वह नहीं होना चाहिए था, यह सही हुआ वह गलत आदि। इस बीच कुछ तत्वों द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम बीच में लाया गया और जताया गया कि जो कुछ हुआ, उनके आदर्शों के अनुरूप ही हुआ। कारण कि गांधी भी राम को मानते थे, राम राज्य की बात करते थे। किसी की आस्था पर कोई आक्षेप नहीं है मगर यहाँ जान लेना ज़रूरी है कि गांधी के राम और गांधी का राम राज्य क्या थे। गांधी सनातनी थे, धार्मिक थे, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। मगर गांधी की धार्मिकता आध्यात्मिक थी, कर्मकांडी नहीं। उन्होंने धर्म के मर्म को अपने जीवन में उतारा, धार्मिक अनुष्ठानों से दूरी बनाए रखी। आपने-हमने गांधी के सैंकड़ो-हज़ारों चित्र ...

सवालों के घेरे में आ रही है हमारी “सभ्यता”

यूँ तो विकासक्रम में मानव असभ्यता से सभ्यता की ओर चलता आया है मगर आजकल कभी-कभी लगता है कि कहीं यह यात्रा उल्टी दिशा में तो नहीं होने लगी है…। एक घृणित अपराधी और उसके भाई की कैमरों के सामने “ लाइव ” हत्या को पिछले दिनों करोड़ों लोगों ने किसी थ्रिलर फिल्म की मानिंद देखा। साथ ही इसे अंजाम देने वालों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वाहवाही भी की। हत्या के वीडियो सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को प्रेषित किए गए। इस बात को एक तरफ रख दें कि इस घटना में हताहत दो अपराधी ही नहीं, कानून का शासन भी हुआ। यह देखें के हत्या, फिर चाहे वह किसी की भी हो, को चटखारे लेकर देखा-दिखाया गया। और यह आपने, हमने, हम जैसों ने ही किया है। यह इंसान के तौर पर हमारे बारे में क्या कहता है ? हमारी संवेदनाओं या उनके अभाव के बारे में क्या कहता है ? हमारे इंसान कहलाने के हक के बारे में क्या कहता है ? बहुत पहले की बात नहीं है। एक युवक ने अपनी लिव-इन पार्टनर के टुकड़े-टुकड़े कर फ्रिज में जमा किए और फिर एक-एक टुकड़ा इधर-उधर फेंकता गया। एक महिला ने बेटे के साथ मिलकर अपने पति का यही हश्र किया। माता-पिता अपनी ही युवा बेटी की हत्या कर...

त्योहार आपको कैसा महसूस करा जाते हैं?

त्योहार बीतने के बाद आप खुद को बुझा-बुझा-सा पाते हैं या फिर ऊर्जावान ? इस सवाल का जवाब आपके बारे में बहुत कुछ कह जाता है।   क्या त्योहारों के बीतने के ठीक बाद आप अपने भीतर एक रीतापन अनुभव करते हैं या फिर खुद को संतृप्त, समृद्ध महसूस करते हैं ? पर्व-उत्सव की खुशियों, उत्साह, उमंग का स्थान उदासी लेती है या संतुष्टि ? आप खुद को बुझा-बुझा-सा पाते हैं या फिर ऊर्जावान ? इन सवालों के जवाब आपके बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं। पर्व-त्योहार हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं, अपनों के साथ मिलने-मिलाने का मौका देते हैं, रुटीन से हटकर आनंद के कुछ पल बिताने का न्योता देते हैं। मगर त्योहार बीत जाने पर कई लोग विषाद से ग्रस्त महसूस करते हैं। खुशियाँ मनाने के पल बीत जाने के बाद फिर वही रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लौटने का विचार उन्हें अवसाद से भर देता है। और इस अवसाद से निकलने में उन्हें काफी वक्त लगता है। वहीं ऐसे लोग भी होते हैं, जो पर्व का भरपूर आनंद लेने के बाद नई ऊर्जा से उत्सव-पूर्व के जीवन में लौट आते हैं। त्योहार उन्हें ‘ रिचार्ज ’ कर जाते हैं। आप इन दोनों में से किस श्रेणी में आते है...

अपराध में सहभागिता का स्वीकार है यह मौन

धर्म के नाम पर राजनीति हुई, अपराध हुए। … और अब इसके नाम पर सरासर अराजकता की ओर कदम बढ़ते दिख रहे हैं। ऐसे में क्यों उस कोने से कोई आवाज़ नहीं आ रही, जहाँ से राह दिखाने वाली रोशनी की उम्मीद की जाती है ?   प्रायमरी स्कूल के समय से ही “ भारत एक कृषि प्रधान देश है ” के साथ-साथ “ भारत एक धर्म प्रधान देश है ” भी सुनता आया हूँ। बड़े होते-होते धर्म को अफीम मानने वालों के तर्क भी सुने और इसे भारतीय समाज को जिलाए रखने वाली प्राणवायु मानने वालों के तर्क भी खूब सुने। व्यक्तिगत निष्कर्ष यह रहा कि हकीकत इन दोनों के बीच कहीं है। यह भी कि “ धर्म ” शब्द का उपयोग जितना आम है, इसके वास्तविक अर्थ को लेकर समझ उतनी ही अस्पष्ट है। मोटे तौर पर लोगों के लिए धर्म का मतलब कर्मकांड और रीति-रिवाज़ ही है। धर्मनिष्ठ या धर्मभीरु समाज होने के चलते कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे यहाँ धर्मगुरुओं का प्राचुर्य है। साथ ही, समाज में इन्हें एक विशेष दर्जा प्राप्त है। यूँ अपने-अपने धर्मगुरु के प्रति अपार आस्था और श्रृद्धा रखते हुए अधिकांश लोग यह स्वीकारने से भी गुरेज नहीं करते कि बड़ी संख्या में कथित “ धर्मगुरु ” फर्...

बलात्कार का चुटकुला बनना…

कोई वीर दास यदि कह दे कि मैं ऐसे देश से हूँ जहाँ दिन में महिलाओं को पूजा जाता है और रात में उनसे सामुहिक दुष्कर्म किया जाता है, तो हमारी धार्मिक और राष्ट्रवादी भावनाएं आहत हो जाती हैं। मगर हमारी सहज मानवीय भावनाएं तब आहत नहीं होतीं जब बलात्कार को हँसने-हँसाने के विषय के रूप में लिया जाता है।   कोई तीस साल पहले कुछ माह के लिए मैंने एम आर ( मेडिकल रेप्रेज़ेंटेटिव ) की नौकरी की थी। इस दौरान खंडवा-बुरहानपुर-नेपानगर के टूर पर था। नेपानगर में काम निपटाकर खंडवा लौटना था। एकाध घंटे के इंतेज़ार के बाद भी बस का अता-पता नहीं था। तभी अखबार के बंडल ले जाने वाली एक वैन आकर रुकी और उसमें सवार “ कंडक्टर ” पूछने लगा कि किस-किसको खंडवा जाना है। पता चला कि यह आम चलन था कि सुबह-सुबह अखबार के बंडल लेकर आने वाले वाहन वापसी में सवारियाँ ढोते, जिससे ड्राइवर और उसके साथी की अतिरिक्त कमाई हो जाती। खैर, “ कंडक्टर ” ने किराया बताया और आठ-दस लोग हामी भरकर वैन में बैठ गए। नियमित बस का कोई ठिकाना न देखते हुए मैं भी वैन में सवार हो गया। आधा रास्ता तय होने के बाद “ कंडक्टर ” सवारियों से पैसे लेने लगा। तभी ए...

“भगवान” की ताजपोशी

ऐसा लग रहा था कि खुशी के अतिरेक में वे ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। फिर “ मतलब… ” के आगे जोड़ बैठे, “ हमारे लिए तो वो भगवान हैं। ”   अधेड़ उम्र के वे सज्जन घर में बने पापड़, अचार आदि बेचने आया करते थे। साथ ही त्योहार के आसपास गुझिया, पूरनपोली, अनारसे, गजक आदि। चुनिंदा घरों में ही जाते, जहाँ उनके नियमित ग्राहक होते। हमारे यहाँ उनका आना कैसे शुरू हुआ, ठीक से याद नहीं मगर लंबे समय तक वे आते रहे। कपड़ा मिल में नौकरी छूट गई थी, जिसके बाद यही उनकी आमदनी का स्रोत था। वे स्वभाव से ज़बर्दस्त बातूनी थे, तिस पर मेरे पिताजी चूँकि धाराप्रवाह मराठी बोल लेते थे और मराठीभाषियों से उनकी ही भाषा में बात करते थे, सो हमारे घर पर इन सज्जन का स्टॉपेज ज़रा लंबा ही खिंच जाता था। मेरी उनसे मुलाकातें कम ही होतीं, क्योंकि जब वे आते, मैं दफ्तर में होता। बात उन दिनों की है, जब कथित अण्णा आंदोलन अपने चरम पर था। मैं “ कथित ” इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरा शुरू से ही मानना था कि अण्णा हज़ारे तो महज़ मुखौटा हैं, पीछे से अन्य शक्तियाँ उन्हें संचालित कर रही हैं। कालांतर में यह बात बहुत हद तक सिद्ध भी हो गई। ...

तत्व नहीं, तमाशा हमें रास आया है

गंभीर विमर्श हमें बोर करता है। चीख-पुकार, अर्थहीन झगड़े, कल्पित षड़यंत्र हमें रास आ गए हैं। यह सब कोई रातो-रात नहीं हुआ है, इस भटकाव ने क्रमिक रूप से हमारे इर्द-गिर्द अपना जाल बुनकर हमें अपने पाश में लिया है। इन दिनों देश के एक बड़े राज्य में और मेरे प्रदेश के एक बड़े भाग में चुनावी शोर चरम पर है। यूँ चुनावी बेला तीखे आरोप-प्रत्यारोप, खोखले वादों और बड़बोले बयानों के लिए जानी जाती है, भारत ही नहीं बल्कि अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में, मगर…। मगर इन दिनों जो देखने में आ रहा है, वह इससे कहीं बढ़कर है। भाषा की मर्यादा तो खैर कभी की लांघी जा चुकी है, प्रभावी भाषण कला के नाम पर फिल्मी ( या कहें नौटंकीनुमा ) डायलॉगबाज़ी अब आम है। साथ ही नमूदार हैं अतिरंजित भावभंगिमाएँ। गंभीर विमर्श के लिए दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं, अति नाटकीयता का बोलबोला। हैरत यह कि इस सबसे उस आम जनता के माथे पर शिकन तक नहीं, जिसकी भलाई के नाम पर यह सारा प्रपंच चल रहा है। ऐसा लगता है कि इसे “ न्यू नॉर्मल ” के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। आखिर यह विकृति सामान्य के तौर पर स्वीकार्य कैसे हो गई ? नव-संपन्नता अपने साथ स...

बिल्ली, तुम रस्ता न काटा करो!

अनिष्ट का भय किस कदर विवेक को हर लेता है, यह देखने के लिए सड़क पर एक बिल्ली दौड़ा दीजिए…। वह लगातार हॉर्न दिए जा रहा था और आगे निकलने को अधीर हो रहा था। मैं धीरे वाहन चलाने के लिए कुख्यात हूँ, फिर चाहे टू व्हीलर हो या फोर व्हीलर, सो ऐसा मेरे साथ अक्सर होता रहता है। ऐसे में मैं जल्द-से-जल्द साइड देकर पीछे आने वाले को ओवरटेक कर आगे निकलने देता हूँ कि जा भई, तू भी खुश रह और मुझे भी शांति से गाड़ी चलाने दे। मगर उस दिन काफी देर तक ऐसा मौका ही नहीं मिल पा रहा था। कभी वह सामने से आ रही किसी गाड़ी के कारण मुझे ओवरटेक नहीं कर पाता, तो कभी मैं रॉन्ग साइड आ रही किसी गाड़ी के कारण उसे साइड नहीं दे पा रहा था। खैर, आखिरकार मौका मिला, मैंने उसे साइड दी और वह फर्राटे से आपनी कार दौड़ाता हुआ मुझे ओवरटेक कर आगे बढ़ गया। मैंने राहत की सांस ली… मगर यह क्या ! ज़रा-सा आगे जाकर ही वह अचानक रुक गया। गाड़ी से कोई उतरा भी नहीं। मुझे समझ नहीं आया कि जो शख्स एक मिनट पहले तक अपनी मंज़िल पर पहुँचने के लिए बेतरह उतावला हो रहा था, वह यूँ ठिठक क्यों गया। तभी मेरी नज़र उसके ठिठकने की वजह पर पड़ी। एक बिल्ली...

कौन खा जाने वाला है हिंदी को?

भाषा को लेकर उठने वाले विवाद और मचने वाली हायतौबा मुझे कभी समझ नहीं आई। यह ज़रूर समझ आया है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण और बहुभाषी देश में कोई एक “ राष्ट्रभाषा “ नहीं हो सकती। एक सवाल बरसों से सुनता आया हूँ- “ पारसी होने, कॉन्वेंट में पढ़े होने के बावजूद तु ? म्हारी हिंदी इतनी अच्छी कैसे है ” यह सवाल हमेशा दो स्तरों पर अटपटा लगता है। पहली बात तो यह कि मेरी हिंदी बिल्कुल सामान्य है। यह वैसी ही है, जैसी हिंदीभाषी राज्य के किसी भी औसत व्यक्ति की होनी चाहिए, होती है। न उससे ज़्यादा, न कम। दूसरी यह कि भाषा ज्ञान का संबंध परिवेश से है, न कि धर्म-जाति-समुदाय से। पारसी होने के नाते मेरी मातृभाषा गुजराती है मगर आजीवन हिंदी प्रदेश में रहने के चलते मेरा हिंदी में निपुण होना स्वाभाविक ही है। रही बात कॉन्वेंट की, तो स्कूल में एमपी बोर्ड का पाठ्यक्रम चलता था और अंग्रेजी माध्यम होते हुए भी शुरू से आखिर तक हिंदी अनिवार्य विषय था। सो यह भी हिंदी जानने-सीखने में बाधक नहीं था। घर में शुरू से ही अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं को आते देखा। नाना-नानी के यहाँ गुजराती अखबार और पत्र...