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Fakhta on the verandah

That corner of the verandah has witnessed the Fakhta cycle of life over and over again for years now. Don’t remember when exactly the Fakhtas first set up their nest in our home but once they did, they really made themselves at home… generations of them! A particular corner of the verandah was their chosen spot, where they built their nest atop the Chameli climber. Eggs were laid, hatched, babies born, learnt to fly and then off they all went – babies, mama and papa. The nest never lay abandoned for too long. A few months later, another Fakhta pair would turn up to start a family. The nest would be refurnished so to speak and off they went again laying eggs, caring for and feeding the babies when they came out etc… That corner of the verandah has witnessed the Fakhta cycle of life over and over again for years now. The Fakhta’s cooing is one of the usual sounds of nature around our house. If they are not on the Chameli, they can be seen basking in the sun on the boundary wal...

खतरे में चौपट राजा की जान

"क्यों न महाराज के मंच पर नीबू-मिर्ची टांग दी जाए, जिससे प्रजा को आभास हो कि महाराज पर संकट कितना गंभीर है ?" फुर्सत में बैठी प्रजा राजा के लिए हानिकारक होती है। खाली बैठे-बैठे उसे राजा में मीन-मेख दिखाई देने लगती है। इसलिए सफल व सुरक्षित राजा वह है, जो प्रजा को लगातार किसी काम पर लगाए रखे। चौपट राजा ने जब से राजपाट संभाला, तभी से प्रजा को लगातार व्यस्त रखने की व्यवस्था कर रखी थी। कभी प्रजा को कतारों में लगाया, तो कभी करों के गुणा-भाग में झोंक दिया। कभी प्रजा गड़े मुर्दों को लेकर झगड़ी, तो कभी खानपान को लेकर लड़ी। राजा का शासन आराम से चलता रहा। मगर बीते कुछ दिनों से राजा को आसन्न संकट की आहट-सी सुनाई देने लगी थी। उसे शक हो चला था कि प्रजा का उससे मोहभंग होने लगा है, वह राजा के दुश्मनों की बातों में आने लगी है। सो इससे पहले कि पानी सर से गुज़र जाए, चौपट राजा ने कुछ करने की ठानी। उसने तय किया कि वह एक जनसभा कर अपने सबसे भरोसेमंद शस्त्र, अपनी वाणी से प्रजा को फिर अपने पक्ष में खड़ा करेगा। इसी जनसभा की तैयारी को लेकर उसने अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई। चौपट राजाः आप ...

चिंता में चौपट राजा

“ हुज़ूर, फसादों से आप और हम कब से चिंतित होने लगे ?  ये तो हमें हमेशा खूब फले हैं। ” चौपट राजा अपने कक्ष में चिंता और गुस्से की मिली-जुली मुद्रा में बैठा था। चिंता हमेशा उसे गुस्सा दिला देती है क्योंकि उसे तो दूसरों को चिंता में डालने की आदत है। ऐसे में यदि कभी यह उसके गले पड़ जाए, तो गुस्सा आना तो लाज़िमी है। तभी शाही वज़ीर का वहाँ आना हुआ। हुज़ूर की मुखमुद्रा देखकर वह क्षण भर को ठिठका, फिर हल्के-से गला खखारते हुए कक्ष में प्रविष्ट हो गया। “ कोई विशेष बात, महाराज ?” “ आओ वज़ीर। कुछ खास नहीं, थोड़ा तनाव-सा महसूस हो रहा था बस। ” “ क्या कह रहे हैं महाराजाधिराज ? तनाव महसूस करें देश के दुश्मन ! ” “ हमें लगा था तुम कहोगे, तनाव महसूस करें आपके दुश्मन। ” “ सेम डिफ्रेंस, महाबली। अब बताइए, सेवक हाज़िर है। ” “ ये जो फसाद चल पड़ा है ना सड़कों पर, विश्वविद्यालयों आदि में… ” “ बस, इतनी-सी बात ? हुज़ूर, फसादों से आप और हम कब से चिंतित होने लगे ? ये तो हमें हमेशा खूब फले हैं। ” “ तुम समझते नहीं, इस बार स्थिति ज़रा अलग है। कुछ करना होगा। ” “ आप चिंता न करें साहे...

बिल्ली, तुम रस्ता न काटा करो!

अनिष्ट का भय किस कदर विवेक को हर लेता है, यह देखने के लिए सड़क पर एक बिल्ली दौड़ा दीजिए…। वह लगातार हॉर्न दिए जा रहा था और आगे निकलने को अधीर हो रहा था। मैं धीरे वाहन चलाने के लिए कुख्यात हूँ, फिर चाहे टू व्हीलर हो या फोर व्हीलर, सो ऐसा मेरे साथ अक्सर होता रहता है। ऐसे में मैं जल्द-से-जल्द साइड देकर पीछे आने वाले को ओवरटेक कर आगे निकलने देता हूँ कि जा भई, तू भी खुश रह और मुझे भी शांति से गाड़ी चलाने दे। मगर उस दिन काफी देर तक ऐसा मौका ही नहीं मिल पा रहा था। कभी वह सामने से आ रही किसी गाड़ी के कारण मुझे ओवरटेक नहीं कर पाता, तो कभी मैं रॉन्ग साइड आ रही किसी गाड़ी के कारण उसे साइड नहीं दे पा रहा था। खैर, आखिरकार मौका मिला, मैंने उसे साइड दी और वह फर्राटे से आपनी कार दौड़ाता हुआ मुझे ओवरटेक कर आगे बढ़ गया। मैंने राहत की सांस ली… मगर यह क्या ! ज़रा-सा आगे जाकर ही वह अचानक रुक गया। गाड़ी से कोई उतरा भी नहीं। मुझे समझ नहीं आया कि जो शख्स एक मिनट पहले तक अपनी मंज़िल पर पहुँचने के लिए बेतरह उतावला हो रहा था, वह यूँ ठिठक क्यों गया। तभी मेरी नज़र उसके ठिठकने की वजह पर पड़ी। एक बिल्ली...

एक फ्लैशबैक एडवांस बुकिंग से “दि एंड’’ तक

तब सिर्फ फिल्म नहीं देखी जाती थी, उसके साथ कई अनुभव जिए जाते थे। ऐसे अनुभव, जो स्मृति पटल पर दर्ज होकर हटने का नाम नहीं लेते…। पहले टीवी और फिर इंटरनेट ने फिल्म देखने का  “ साधारणीकरण ’’  कर दिया। अब शहर के बेहतरीन मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखना भी कोई बहुत खास बात नहीं रह गई क्योंकि आप कभी भी, कहीं भी फिल्म देख सकते हैं और देख भी लेते हैं।  एक समय सिनेमा हॉल में जाकर फिल्म देखना एक इवेंट हुआ करता था। और इस इवेंट से कुछ यादें अलग से जुड़ जाती थीं। मुझे सिनेमा हॉल में देखी हुई लगभग हर फिल्म के साथ यह भी याद है कि वह किस थिएटर में देखी थी। साथ ही, उस फिल्म को देखने से जुड़ी कुछ बिल्कुल असंबद्ध-सी बातें भी न जाने क्यों और कैसे स्मृति पटल पर अंकित हैं। नितांत सामान्य बातें, जिन्हें याद रखने योग्य भी नहीं कहा जा सकता लेकिन  “ फिल्म देखने ’’  के अनुभव के साथ ये भी नत्थी हो गई हैं। मसलन यह कि इंदौर के एलोरा टॉकीज़ में  “ अर्जुन पंडित ’’ (1976)  देखते वक्त मम्मी को चूहा काट गया था या यह कि इंदौर के ही अलका टॉकीज़ में  “ हीरालाल पन्नालाल ’’ ...

तोता हाज़िर हो!

अदालत में तोते, बाज़ार से सामान मंगवाने वाले तोते और हत्या के गवाह तोते… ! कुछ दिन पहले दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में तेरह तोते पेश किए गए। अदालत में पशु-पक्षी पेश होने के मामले विरले ही होते हैं और यह ऐसा ही मामला था। एक उज़बेक नागरिक इन्हें चोरी-छुपे ताशकंद ले जाने का प्रयास करते हुए इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर धराया था और बरामद माल के तौर पर इन तोतों को कोर्ट में पेश किया जाना लाज़िमी था। बताते हैं कि जज साहब ने तोतों से यूँही पूछ भी लिया कि आप लोगों को कहाँ ले जाया जा रहा था। इस पर बंद बक्सों से बरामद थके-मांदे तोते चुप ही रहे…। यूँ तोते चुप रहने के लिए नहीं जाने जाते। टैं-टैं तो इनकी चोंच पर सदा बैठी ही रहती है, साथ ही इनकी ख्याति ही मुख्य रूप से इस बात के लिए है कि ये इंसानी बोली की ज़बर्दस्त मिमिक्री कर लेते हैं। एक समय अनेक घरों में छोटे पिंजरे लटकते पाए जाते थे, जिनमें पालतू तोता आने-जाने वालों के आकर्षण का केंद्र हुआ करता था। अब पशु क्रूरता के प्रति जागरूकता के चलते या फिर किसी और वजह से यह चलन काफी कम हो गया है। जो भी हो, तोतों का बातुनीपन हमे...

लिफ्ट प्लीज़!

किसी अनजान को लिफ्ट देना ठीक नहीं, मगर तब क्या किया जाए जब अनजान खुद ही लिफ्ट ले ले ? जब पहले-पहल वाहन चलाना शुरू किया, तभी से यह नसीहत गांठ बाँध ली थी कि अजनबियों को लिफ्ट नहीं देना, ज़माना खराब है…। तब से अब तक कोई दो-चार मौके ही ऐसे आए हैं, जब अनजान लोगों को लिफ्ट न देने का नियम तोड़ा। ये ऐसे मौके रहे हैं, जिनके बारे में अब सोचने पर हँसी आए बिना नहीं रहती। पहला किस्सा तब का है, जब वाहन चलाना शुरू किए ज़्यादा समय नहीं हुआ था। एक सहकर्मी-मित्र की शादी थी, शहर के सुदामानगर इलाके में। शहर का वह हिस्सा तब मेरे लिए नितांत अजनबी था, सो दूल्हे राजा से निमंत्रण के साथ ही विवाह स्थल तक पहुँचने के दिशा-निर्देश भी प्राप्त कर लिए। मुझे बताया गया कि सेठी गेट नामक प्रसिद्ध लैंडमार्क है, जो मुझे मिल ही जाएगा। वहाँ किसी से भी फलाँ मंदिर ( मंदिर का नाम अब मैं भूल रहा हूँ ) के बारे में पूछूँ, तो वह बता देगा। बस, उस मंदिर के सामने स्थित बगीचे में ही आयोजन है…। शादी के दिन मैं अपनी लूना पर निकल पड़ा। काफी ढूँढने पर भी सेठी गेट नहीं मिला। आखिर एक जगह रुककर पूछा, तो बताया गया कि सेठी गेट त...