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तत्व नहीं, तमाशा हमें रास आया है

गंभीर विमर्श हमें बोर करता है। चीख-पुकार, अर्थहीन झगड़े, कल्पित षड़यंत्र हमें रास आ गए हैं। यह सब कोई रातो-रात नहीं हुआ है, इस भटकाव ने क्रमिक रूप से हमारे इर्द-गिर्द अपना जाल बुनकर हमें अपने पाश में लिया है। इन दिनों देश के एक बड़े राज्य में और मेरे प्रदेश के एक बड़े भाग में चुनावी शोर चरम पर है। यूँ चुनावी बेला तीखे आरोप-प्रत्यारोप, खोखले वादों और बड़बोले बयानों के लिए जानी जाती है, भारत ही नहीं बल्कि अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में, मगर…। मगर इन दिनों जो देखने में आ रहा है, वह इससे कहीं बढ़कर है। भाषा की मर्यादा तो खैर कभी की लांघी जा चुकी है, प्रभावी भाषण कला के नाम पर फिल्मी ( या कहें नौटंकीनुमा ) डायलॉगबाज़ी अब आम है। साथ ही नमूदार हैं अतिरंजित भावभंगिमाएँ। गंभीर विमर्श के लिए दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं, अति नाटकीयता का बोलबोला। हैरत यह कि इस सबसे उस आम जनता के माथे पर शिकन तक नहीं, जिसकी भलाई के नाम पर यह सारा प्रपंच चल रहा है। ऐसा लगता है कि इसे “ न्यू नॉर्मल ” के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। आखिर यह विकृति सामान्य के तौर पर स्वीकार्य कैसे हो गई ? नव-संपन्नता अपने साथ स...

कहर बरपाएगा ज़ंग लगा चाँद!

क्या मान लें कि हमारा चाँद अब कबाड़ हो चला है ? क्या ज़माना आ गया है ! कलजुग… घोर कलजुग ! हमारे श्वेत-धवल चाँद को ज़ंग लग रही है ! जी हाँ, अंतरिक्ष विज्ञानियों ने बीते दिनों चाँद की सतह पर आयरन ऑक्साइड की मौजूदगी पाई। आयरन ऑक्साईड यानी रस्ट… ज़ंग। तो क्या सौंदर्य के पर्याय के रूप में चाँद के दिन अब लदने को हैं ? इसके दागों को तो हमने सदियों से सहज स्वीकार कर रखा है, इन्हें चाँद के मुखड़े पर नज़र के टीके के तौर पर मान लिया है। लेकिन ज़ंग… ? नहीं नहीं, यह नहीं चलेगा। ज़रा कल्पना कीजिए, ज़ंग लगा चाँद हमारे साहित्य-कला जगत, हमारी रूमानियत की दुनिया में किस कदर कहर बरपाने वाला है। अब जब “ शाम को खिड़की से चोरी-चोरी नंगे पाँव चाँद आएगा ” तो क्या सीटी बजाने के बजाए अपने ज़ंग लगे पुर्जों की चर्र-चूँ, चर्र-चूँ सुनाएगा ? जब प्रेमी अपनी प्रेयसी की तारीफ में उसके चेहरे को “ चाँद जैसा मुखड़ा ” कहेगा, तो कहीं वह इसे उलाहने के तौर पर तो नहीं लेगी ? जब कोई “ चाँद के टुकड़े ” की बात करेगा तो क्या उससे प्रश्न किया जाएगा कि “ कौन-सा टुकड़ा भाई ? कहीं ज़ंग लगे हिस्से से तो नहीं तोड़ लाए न...

चौपट राजा का दाढ़ी रहस्य

सारे मंत्री अपने-अपने कयास लगाते हुए चिंता के महासागर में गोते लगा रहे थे कि आखिर चौपट राजा की दाढ़ी इतनी बढ़ कैसे गई ! चौपट राजा के दरबार में एक अजब-सी बेचैनी पसरी थी। मंत्रियों के मन में मनों प्रश्न उमड़ रहे थे किंतु होठों पर ताले थे। चक्रवर्ती महाराजाधिराज बीते कुछ समय से बदले-बदले-से लग रहे थे। उनकी चिर-परिचित दहाड़ अब न के बराबर सुनाई पड़ती थी। फकीरी का दम भरने वाले सम्राट का माथा चिंता की लकीरों की चुगली करता प्रतीत हो रहा था। और… और… मुखमंडल पर जहाँ पहले तेज फैला हुआ रहता था, वहाँ अब पसरी हुई नज़र आ रही थी विस्तृत केश राशि। यूँ महाराजाधिराज हमेशा से दाढ़ी-मूँछ रखते थे मगर हाल के महीनों में इनकी अनियंत्रित वृद्धि पर प्रजा के साथ-साथ मंत्रियों का भी ध्यान गया था। सब जानते थे कि महाराज अपनी छवि को लेकर कितने चौकस-चौकन्ने रहते हैं। यह संभव नहीं था कि वे अचानक इस ओर से लापरवाह हो गए हों। फिर क्या कारण हो सकता था कि सम्राट अपने चेहरे पर केश राशि को यूँ खुली छूट दे रहे थे ? सवाल सबके मन में घुमड़ रहे थे मगर पूछे कौन ? सब जानते थे कि महाराज को प्रश्न पूछे जाने से सख्त धृणा थी। ...

बुद्धू बक्से पर “प्रीतम” का एनकाउंटर!

दूरदर्शन के स्वर्णिम युग में उस पर देखी गई फिल्मों की स्मृतियों के साथ ही नत्थी हैं उनके साथ हुए  “ एनकाउंटरों ” की भी यादें…। “ पिक्चर ” या “ मूवी ” या “ फिल्म ” को आधिकारिक भाषा में “ फीचर फिल्म ” कहा जाता है, यह हमारी पीढ़ी को दूरदर्शन ने सिखाया। जिस दौर में टीवी के नाम पर देश में दूरदर्शन के रूप में एक ही विकल्प था, तब इस पर प्रसारित होने वाली फिल्में सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करती थीं। मगर दूरदर्शन ठहरा सरकारी महकमा, सो फिल्मी मनोरंजन की परोसगारी में भी अक्सर सरकारीपन झलक जाता था। अव्वल तो इस पर फिल्मों को हमेशा “ फीचर फिल्म ” कहकर संबोधित किया जाता था। फिर यह भी था कि ताज़ा-ताज़ा बनकर निकली फिल्म को थिएटर में प्रदर्शन से पहले एक बार सेंसर बोर्ड की कैंची से होकर गुज़रना पड़ता था लेकिन दूरदर्शन पर हर प्रदर्शन से पहले उसे खुद को मंडी हाउस के आकाओं की कैंची के हवाले करना होता था। … और वहाँ से वह किस रूप में निकलकर दर्शकों तक पहुँचती, यह बहुत कुछ तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री और दूरदर्शनी बाबुओं की सनक पर निर्भर करता था। इसका नतीजा कई बार हास्यास्पद और कभी-कभी “ ...

जीने का तो जाने कहाँ ढंग गया है…!

जीने का ढंग कहीं जाता नहीं, बस बदलता रहता है…। कोई चार दशक पहले आई फिल्म “ बातों-बातों में ” के गीत “ उठे सबके कदम, देखो रम-पम-पम ” में एक पंक्ति आती है, “ रूप नया है, रंग नया है, जीने का तो जाने कहाँ ढंग गया है… ” । लगभग हर दौर की पुरानी पीढ़ी को नए रूप - रंग से यह शिकायत रहती आई है। और इस शिकायत को दरकिनार करते हुए जीने का ढंग नित बदलता रहा है। क्योंकि जीने के कोई ढंग शाश्वत नहीं होता। जी हाँ, जीने का ढंग कहीं जाता नहीं है, बस बदलता रहता है। हर नई पीढ़ी जीने का अपना ढंग, अपना अंदाज़ लेकर आती है। और जो अपने ही ढंग को एकमात्र स्वाभाविक, वाजिब ढंग मानते हैं, वे शिकायत करते रह जाते हैं कि जीने का ढंग जाने कहाँ चला गया…। जीने का ढंग केवल पीढ़ियाँ बदलने पर ही नहीं बदलता, कई अन्य घटनाक्रम भी इसे बदल डालते हैं। हम देख ही रहे हैं, कैसे महामारी ने देश - दुनिया में अरबों लोगों के जीने के ढंग को बदल डाला। महामारी छोड़िए, कई गैर - संक्रामक गंभीर बीमारियाँ भी रोगी और काफी हद तक उसके पूरे परिवार को जीने का ढंग बदलने पर विवश कर देती हैं। परिवार में शिशु, खास तौर पर पहले शिशु का आगमन...

Of thundering typhoons and blistering barnacles…

Captain Haddock, Professor Calculus, Bianca Castafiore, Thomson and Thompson…. Do these names ring a bell? I was first introduced to the world of Tintin sometime in the late seventies, when the Times of India serialized “The Red Sea Sharks”. Though not yet ten, it was obvious to me that this was no run of the mill comic strip. The characters, the narrative, the entire package so to say, held me in thrall. Shortly thereafter we chanced upon Tintin comic books in a book shop in Mumbai (then Bombay). Again, these were unlike the usual comic books we were used to. Large pages, all 62 of them, filled with colourful, detailed drawings and taking forward a single story full of adventure, thrills and humour. They were also more expensive as compared to the comics we were used to buying but it was decided that the money spent would be worth it and so the first Tintin book came into our hands. It was “Flight 714”, my brother’s choice. Upon returning to Indore from our vacation, we...

इन्हें कहना नहीं पड़ता, 'अपना ही घर समझो'

संसार के भीतर एक अलग संसार देखना हो, तो इन गौरैयाओं को निहारें। वे पूरे अधिकार से मेरे आंगन में कब्जा जमाए रहती हैं। कभी मधुकामिनी की डाल पर चहचहाती, कभी चमेली की बेल पर फुदकती, तो कभी ज़मीन पर अपना आहार बीनती-चुगती या सकोरे पर जाकर गला तर करती। अल-सुबह से ही इनकी चीं-चीं शुरू हो जाती है। गोया संसार चलाने का सारा दारोमदार इन्हीं पर है। ज़रा चुप रहीं या थोड़ी देर तक सोई रहीं, तो ब्रह्माण्ड थम जाएगा ! एक समय था, जब अक्सर सुनने में आता था कि गौरैया लुप्तप्राय होती जा रही है लेकिन यहाँ बीते कई साल से ये आबाद हैं। नए ज़माने के घरों के हिसाब से इन्होंने खुद को ढाल लिया लगता है। इंसान से पहले भी इनका रिश्ता घरापे का था और अब भी वही बेतकल्लुफी कायम है। इन्हें कहने की ज़रूरत नहीं होती कि इसे अपना ही घर समझो, ये तो घर को अपना मानकर ही चलती हैं। दाना-पानी के लिए इन्हें कहीं दूर नहीं जाना पड़ता, सो पूरा दिन आँगन और उसके आसपास ही बीतता है। इनका बस चले, तो दरवाज़े-खिड़की खुले मिलने पर तफरीह करते-करते भीतर ही चली आएँ ! जब घोंसला बनाने के लिए कच्चा माल दरकार हो, तो ये हमारी नाक के नीचे से ...