Skip to main content

कर्फ्यू किस्सा…



कर्फ्यू लगा होने पर खौफ के वातावरण और पुलिसिया बर्बरता के किस्से अक्सर सुनने में आते हैं लेकिन कभी-कभी इससे बिलकुल विपरीत प्रकृति के किस्से भी सामने आते हैं।

बात 1990 की है, जब लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के दौरान गिरफ्तारी के बाद देश के कई हिस्से कर्फ्यू के साये में थे। इंदौर के पास स्थित सैनिक छावनी महू (अब डॉ अंबेडकर नगर) में मेरी बुआ अकेली रहती थीं और उन दिनों उनकी तबीयत भी कुछ नासाज़ थी। यूँ काम वाली बाई हारी-बीमारी में उनकी तीमारदारी भी कर लेती थी लेकिन कर्फ्यू के चलते वह भी अपने घर में कैद थी।
बुआ के घर से कोई सौ-डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर उनकी पुरानी सहेली रहती थीं। उन्हें बुआ की चिंता सता रही थी। एक दिन उन्होंने बुआ के लिए दलिया बना लिया लेकिन दिक्कत यह थी कि उसे बुआ तक पहुँचाया कैसे जाए क्योंकि कर्फ्यू का बड़ी कड़ाई से पालन कराया जा रहा था। ऐसे में उनकी नज़र घर से कुछ दूर तैनात युवा पुलिस कांस्टेबल पर पड़ी। बस, दादी-नानियाँ जिस रौब और अधिकार से मोहल्ले के बच्चों-युवाओं को आदेश सुनाती हैं, कुछ उसी अंदाज़ में उन्होंने उस कांस्टेबल को पास बुलाया और सीधे-सीधे कह दिया, “उधर वो मकान देख रहे हो ना, वहाँ मेरी सहेली रहती है। अकेली है, बीमार है। मैंने उसके लिए यह दलिया बनाया है लेकिन तुम मुझे या किसी और को तो जाने नहीं दोगे। तो तुम ही उसे यह दे आओ ना! कह देना, मैंने भेजा है।”
मैं इस मौके पर मौजूद नहीं था, सो पक्के तौर पर नहीं कह सकता लेकिन यह सुनकर युवा कांस्टेबल भी पल भर को तो ज़रूर देखता रह गया होगा। खैर, अगले पल वह दलिये का डिब्बा लेकर चल पड़ा।
ऐन कर्फ्यू के दौरान दरवाज़े पर दस्तक सुनकर बुआ का घबरा उठना लाज़िमी था। खिड़की में से झाँकने पर जब उन्होंने द्वार पर वर्दीधारी को खड़ा पाया तो वे और चौंक पड़ीं। खिड़की से ही आवाज़ लगाई, “कौन है? क्या है?”
कांस्टेबल ने सहजता से कह दिया कि वो उधर वाली आंटी ने आपके लिए दलिया भेजा है, दरवाज़ा खोलो और ले लो।
… बुआ ने जब यह किस्सा सुनाया था, तो मेरे मन में तब तक पुलिसकर्मियों के बारे में व्याप्त रही धारणा काफी हद तक बदल गई थी।
(चित्र प्रतीकात्मक है, इंटरनेट से)

Comments

Popular posts from this blog

बंदर और उस्तरे

बंदर हैं , उस्तरे हैं बंदरों के हाथों में उस्तरे हैं उस्तरे पाकर बंदर लहालोट हैं।   बंदर हैं , बंदरों की बिरादरी है बंदरों की बिरादरी में गज़ब का बंधुत्व भाव है उस्तरे लहराने का स्पर्धा भाव है।   बंदर हैं , बंदरों का खेल है बंदर खेल रहे खेल पैनी धार का बंदर लिख रहे लेखा सब संसार का।   उस्तरे लिए निकल पड़े हैं बंदर , ब्रह्मांड बदलने खैर मनाओ सब अपनी कि बंदरों के हाथ पड़ गए उस्तरे हैं ! 

अंकलजी बने शहंशाह

जब लड़कियों को सिगरेट पीते देख अंकलजी का खून खौला, तब उन्होंने तय किया कि उन्हें ही अब कुछ करना होगा। “ शहंशाह ” बनना होगा।     एक बुजुर्ग अंकल हैं। उन्हें कई दिनों से बड़ा गुस्सा आ रहा था। समाज में फैली बुराइयाँ उन्हें एंग्री ओल्ड मैन बना रही थीं। अपने इलाके के एक कैफे के बाहर खड़े होकर सिगरेट पीने वाली लड़कियाँ तो उन्हें खासतौर पर कुपित कर रही थीं। बस, अंकल ने सोच लिया कि बुराई को खत्म करने के लिए अपने को ही कुछ करना होगा। यूँ देश-समाज में ढेरों बुराईयाँ व्याप्त हैं मगर अंकलजी की नज़रों में शायद सबसे ज्वलंत बुराई यही है कि लड़कियाँ सिगरेट पीकर बिगड़ रही हैं। वैसे उन लड़कियों के साथ लड़के भी कैफे के बाहर खड़े होकर सिगरेट पीते थे लेकिन उनकी बात और है। आफ्टर ऑल, बॉइज़ विल बी बॉइज़। खैर, अंकलजी ने तय किया कि उन्हें ही समाज को सुधारने के लिए निकलना होगा। अपने ज़माने में अंकलजी फिल्मों के बड़े शौकीन रहे हैं। और अपने ज़माने के अधिकांश सिने प्रेमियों की ही तरह बिग बी के ज़बर्दस्त फैन भी रहे हैं, जिन्हें तब बिग बी नहीं बल्कि एंग्री यंग मैन कहा जाता था। तो जब लड़कियों को सि...

लिफ्ट प्लीज़!

किसी अनजान को लिफ्ट देना ठीक नहीं, मगर तब क्या किया जाए जब अनजान खुद ही लिफ्ट ले ले ? जब पहले-पहल वाहन चलाना शुरू किया, तभी से यह नसीहत गांठ बाँध ली थी कि अजनबियों को लिफ्ट नहीं देना, ज़माना खराब है…। तब से अब तक कोई दो-चार मौके ही ऐसे आए हैं, जब अनजान लोगों को लिफ्ट न देने का नियम तोड़ा। ये ऐसे मौके रहे हैं, जिनके बारे में अब सोचने पर हँसी आए बिना नहीं रहती। पहला किस्सा तब का है, जब वाहन चलाना शुरू किए ज़्यादा समय नहीं हुआ था। एक सहकर्मी-मित्र की शादी थी, शहर के सुदामानगर इलाके में। शहर का वह हिस्सा तब मेरे लिए नितांत अजनबी था, सो दूल्हे राजा से निमंत्रण के साथ ही विवाह स्थल तक पहुँचने के दिशा-निर्देश भी प्राप्त कर लिए। मुझे बताया गया कि सेठी गेट नामक प्रसिद्ध लैंडमार्क है, जो मुझे मिल ही जाएगा। वहाँ किसी से भी फलाँ मंदिर ( मंदिर का नाम अब मैं भूल रहा हूँ ) के बारे में पूछूँ, तो वह बता देगा। बस, उस मंदिर के सामने स्थित बगीचे में ही आयोजन है…। शादी के दिन मैं अपनी लूना पर निकल पड़ा। काफी ढूँढने पर भी सेठी गेट नहीं मिला। आखिर एक जगह रुककर पूछा, तो बताया गया कि सेठी गेट त...